| Jan 01, 1970 | Daily Report |
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20761. बाराबंकी के सरकारी टीचर ने छुट्टी लेकर, फल-सब्जियों की खेती शुरू की, सालाना एक करोड़ हो रही है कमाई
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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- अमरेंद्र अभी 60 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं, 30 एकड़ जमीन पर पारंपरिक फसल और बाकी 30 एकड़ पर फल और सब्जियां उगाते हैं
- उनकी टीम में 35 लोग काम करते हैं, इसके साथ ही आसपास के गांवों के किसान भी बड़ी संख्या में उनके साथ जुड़े हुए हैं
- अमरेंद्र कहते हैं कि मैंने तय कर लिया था कि अब जो भी हो खेती ही करना है। मैंने गूगल और यूट्यूब पर थोड़ा खेती के बारे में सर्च किया। फिर केले की खेती का आइडिया मिला। जो किसान पहले से इसकी खेती करते थे, उनके पास जाकर इसके बारे जानकारी जुटाई। खेती की बारीकियों को समझा।
20762. लॉकडाउन में घर को हरा-भरा करने की शुरू की मुहिम, आम-अनार से लेकर गाजर-मूली भी मिलेगा यहाँ
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- इंदौर की श्वेता वैद्य ने जब फूड स्टॉल लगाने का सोचा, तब उनके पास काम का कोई एक्सपीरियंस नहीं था, मजबूरी में शुरू करना पड़ा था बिजनेस
- शुरू के बीस दिन ग्राहक मिलना मुश्किल हो गए थे, फिर पड़ोस में लगने वाले फूड स्टॉल को देखकर आया नया आयटम रखने का आइडिया
- श्वेता के पास जॉब करने का भी विकल्प था, लेकिन उन्होंने खुद का कुछ सेट करने का सोचा और बढ़ गईं आगे
20763. बेटी को थी दूध से एलर्जी, मां ने लुधियाना में शुरू किया ऐसा काम, आज बन गई सफल कारोबारी
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- बेटी को चौदह वर्ष की उम्र में दूध से एलर्जी हुई और पेट दर्द रहने लगा तो मां ने उसे दूध से बने उत्पादों के बजाय अन्य उत्पाद देने शुरू किए। उसको दूध की जगह बादाम व सोया दूध देना शुरू कर दिया, ताकि स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव न पड़े। इसके बाद उन्होंने केमिकल मुक्त बेकरी उत्पाद बनाना शुरू कर दिए।
- ज्योति गंभीर का नाम आज कामयाब कारोबारियों में शुमार है। उन्होंने बताया कि यह उत्पाद बनाने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के होम साइंस कालेज से प्रशिक्षण लिया। पहले अपने घर व रिश्तेदारों के लिए बिना दूध व दूध से बने बिना केमिकल के उत्पाद बनाने शुरू किए। इनको सभी ने सराहा। उन्होंने बताया कि जब भी हम चाय के साथ एक बिस्कुट भी खाते हैं, मानो हम केमिकल खाते हैं, इसलिए मैंने ठान लिया कि परिवार और अन्य लोगों के लिए टेस्ट विद हेल्थ के पैमाने पर उत्पाद बनाऊंगी।
- ज्योति गंभीर ने बताया कि जब मैंने अपने हुनर को बढ़ाने के लिए पीएयू से दो महीने की ट्रेनिंग ली तो तो मिनिस्ट्री आफ एग्रीकल्चर के तहत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) ने स्कीम शुरू कर फार्म भरवाए थे। तब उन्होंने अपने तैयार किए जा रहे उत्पादों को लेकर फार्म भरा। उनका फार्म मिनिस्ट्री आफ एग्रीकल्चर ने स्वीकार कर प्रशिक्षण देना शुरू किया। तब उनके बनाए गए केमिकल रहित बेकरी उत्पादों को विभाग के अधिकारियों ने स्वाद चखा और विभाग की ओर से उनको बेकरी का कारोबार शुरू करने का प्लेटफार्म देने का अवसर दिया। अब उनको आरकेवीवाई ने 16 लाख रुपये की ग्रांट जारी की है, ताकि बेकरी प्लांट स्थापित करने के लिए मशीनरी खरीदी जा सके।
20764. दादी का बनाया खाना लोगों तक पहुँचाने के लिए छोड़ी नौकरी, अब 1.5 करोड़ रुपये है सालाना आय
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- दादी-चाची के हाथों से बने भोजन का स्वाद ही कुछ और होता है। इसी स्वादिष्ट स्वाद को घर-घर तक पहुँचाने के लिए मुरली गुंडन्ना ने बेंगलुरु में अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने “फ़ूड बॉक्स” नाम से एक स्टार्टअप की शुरूआत की जहाँ से घर का पका खाना लिया जा सकता है।
- मुरली कहते हैं, “मेरे बॉस ने इसे बहुत ही सकरात्मक तरीके से लिया और उन्होंने मुझे तीन महीने पेड लीव देने की पेशकश की।” उन्होंने सप्ताह में 10 फूड बॉक्स बेचने से शुरूआत की और अब वह एक दिन में हज़ारों फूड बॉक्स बेचते हैं। मुरली इसका श्रेय अपनी दादी और चाची को देते हैं। मुरली के स्टार्टअप की यह कहानी बड़ी दिलचस्प है।
- शुरूआती दिनों में मुरली एक दिन में 15-20 बॉक्स बेचते थे जबकि आज की तारीख में वह एक हफ्ते में 2,000 बॉक्स बेचते हैं।
20765. हैदराबाद: मंदिरों से फूल इकट्ठा कर उनसे अगरबत्ती, साबुन आदि बना रहीं हैं ये सहेलियाँ
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- हैदराबाद में रहने वाली माया विवेक और मीनल दालमिया, Holy Waste ब्रांड के अंतर्गत फूलों को प्रोसेस करके अगरबत्ती, धूपबत्ती, खाद और साबुन जैसे उत्पाद बना रहीं हैं!
- माया और मीनल ने सबसे पहले एक मंदिर में बात की और वहाँ से फूल आदि को इकट्ठा करके घर पर लाने लगीं। उन्होंने पहले अपने घर पर इनकी प्रोसेसिंग की। जैविक खाद बनाना उन्हें आता था इसलिए इसमें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने अगरबत्ती बनाने पर काम किया। घर पर वह छत पर फूलों को सुखातीं और फिर इन्हें मिक्सर में पिसती और फिर आगे की प्रक्रिया करतीं। एक-दो बार के ट्रायल से जब वह अगरबत्ती बनाने में सफल रहीं तो उन्होंने इसमें आगे बढ़ने की सोची।
- सभी मंदिरों में उन्होंने अपने डस्टबिन रखवाए हुए हैं और इन्हें प्रोसेसिंग यूनिट तक लाने के लिए कामगार लगाए हैं। मंदिरों के अलावा शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में भी बचने वाले फ्लोरल वेस्ट को वह इकट्ठा करके प्रोडक्ट्स बनाने में लगा रही हैं। हर दिन वह लगभग 200 किलो फ्लोरल वेस्ट को नदी-नाले में जाने से रोक रही हैं।
20766. मिलिए ‘मखाना मैन ऑफ इंडिया’ सत्यजीत सिंह से, जिन्होंने बिहार में बदल दी मखाना खेती की तस्वीर
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- मखाना को सुपरफूड के रूप में जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज दुनिया में कुल मखाने का 90 फीसदी उत्पादन बिहार में होता है? बिहार में मखाना खेती को लेकर एक क्रांति की शुरुआत करने वाले सत्यजीत सिंह हैं, जिन्हें ‘मखाना मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है। सत्यजीत आज बिहार में 50 फीसदी मखाना उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं और अनुमान है कि वह अगले 2-3 वर्षों में कुल मखाना उत्पादन में 70 से 75 फीसदी योगदान देने में सफल होंगे।
- साकेत के अधिकांश किसान साथी गेहूँ और धान की खेती करते हैं, लेकिन उन्होंने मखाना की खेती करने का फैसला किया। इससे साकेत को न सिर्फ अपने परिवार को कर्ज से उबारने में मदद मिली, बल्कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में भी मदद मिली।
- साकेत मखाना के बीज को बेच कर सालाना 3.5 लाख रूपये कमाते हैं और फिर बचे हुए बीजों को कुछ दिनों के बाद 30% अधिक मूल्य पर बेचते हैं। इस तरह हर साल उन्हें 4.5 लाख रूपए की कमाई होती है।
20767. ब्लॉग से शुरू हुई थी तीन दोस्तों ‘गाथा’, आज करते हैं करोड़ों का कारोबार
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- साल 2013 में सुमिरन ने अपने दोस्त शिवानी धर और हिमांशु खार के साथ मिलकर हैंडिक्राफ्ट को बढ़ावा देने के लिए 5 लाख रुपए की लागत से अपनी ई-कॉमर्स कंपनी ‘गाथा’ को शुरू किया था। आज यह कंपनी हर साल करोड़ों का कारोबार करती है।
- भारतीय हस्तकला की लोकप्रियता पूरी दुनिया में है, लेकिन हाल के वर्षों में उद्योगों में मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण इसकी चमक फीकी पड़ने लगी है। लेकिन, सुमिरन पांड्या ने भारतीय हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसी पहल की शुरूआत की, जिससे कारीगरों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित होने के साथ ही वह खुद भी करोड़ों की कमाई कर रहे हैं।
- सुमिरन ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर जिस कारोबार को महज 5 लाख रुपए से शुरू किया था, उसके जरिए आज वह हर साल करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। खास बात यह है कि गाथा ने यह मकाम खुद ही हासिल किया है और उन्हें अब तक किसी निवेशक की जरूरत नहीं पड़ी।
20768. नीदरलैंड से खेती सीखी, सालाना 12 लाख टर्नओवर; देश के पहले किसान, जिसने धनिया से बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड
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- अभी आठ एकड़ जमीन पर सेब और मसालों की खेती कर रहे हैं गोपाल, सेब की खेती के लिए उन्होंने नीदरलैंड और फ्रांस जाकर ट्रेनिंग ली है
- अभी सेब के साथ ही हल्दी, लहसुन, धनिया सहित कई मसालों की भी खेती करते हैं, वो कहते हैं कि एक इंच भी जमीन खाली नहीं जानी चाहिए
- गोपाल बताते हैं कि सेब की खेती के लिए सबसे जरूरी चीज है इसकी ट्रेनिंग। किसी एक्सपर्ट किसान से सेब की खेती को समझना चाहिए। जरूरत पड़े तो कुछ दिन किसानों के साथ रहकर हर छोटी बड़ी जानकारी हासिल करनी चाहिए। दूसरी सबसे अहम बात है कि इसकी खेती के लिए ठंडी वाली जगह होनी चाहिए। पहाड़ी बर्फीली इलाके में सेब की अच्छी खेती होती है। इसके साथ ही धैर्य और डेडिकेशन की भी जरूरत होती है। प्लांट्स की अच्छे तरीके से देखभाल की जरूरत होती है।
20769. मोती की खेती से बने लखपति, शिक्षित युवाओं से करते हैं किसानी करने की अपील
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- विजेंद्र ने द बेटर इंडिया को बताया, “गाँव में मेरे चार तालाब हैं। इनमें तीन 60×40, जबकि एक 60×50 मीटर का है। एक तालाब में 5000 से लेकर 7000 तक सीप डाले जाते हैं। इनका मॉर्टेलिटी रेट 30 फीसदी के आस पास है। 70 प्रतिशत के करीब सीप मिल जाता है। एक सीप में दो मोती होते हैं। इस तरह 5000 सीप से 10 हजार के करीब मोती प्राप्त हो जाते हैं। एक मोती न्यूनतम सौ से डेढ़ सौ रूपये का बिकता है। एक तालाब से 5.50 लाख रुपये से अधिक की कमाई हो जाती है।”
- विजेंद्र के ज्यादातर मोती की सप्लाई हैदराबाद में होती है। इसके अलावा हरिद्वार, ऋषिकेश जैसी जगहों पर भी इनकी अच्छी मांग है। तीर्थ स्थान होने की वजह से मोती की बनी माला, अंगूठी आदि में धारण करने के लिए इन मोतियों की मांग वहाँ से आती है।
- विजेंद्र बताते हैं कि वह मोती की खेती के साथ मछली पालन भी करते हैं। इससे उनकी अतिरिक्त आय होती है। इसके अलावा वह अन्य किसानों को मोती की खेती के लिए प्रशिक्षित भी करते हैं।
20770. कुल्हड़ से बनी छत और लकड़ी-पत्थर के शानदार मकान, ये आठ दोस्त बदल रहे हैं गाँवों की तस्वीर
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- सेंटर फॉर एनवायरमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी (CEPT), अहमदाबाद के 8 साथियों ने मिलकर कॉलेज के दिनों में ही कंपार्टमेंट्स एस4 (Compartments S4) नाम से एक आर्किटेक्चर कंपनी शुरू कर दी थी। इसके तहत उनका लक्ष्य सतत वास्तुकला के जरिए सामुदायिक विकास को बढ़ावा देना है।
- मोनिक शाह कहते हैं कि गाँव के लोगों के लिए छोटी-छोटी चीजों के भी बड़े मायने होते हैं। घुग्गूखाम गाँव के प्रवेश स्थल पर एक साइन बोर्ड लगा था, जो बेकार हो चुका था। इसलिए हमने वहाँ नया साइन बोर्ड लगाते हुए, उसमें एक स्पीकर लगा दिया। इसमें स्थानीय पक्षियों, लोक गीतों बारिश आदि की आवाज रिकार्डेड थी और जब भी वहाँ से कोई गुजरता, तो इसमें से काफी मीठी आवाज आती “घुग्गूखाम में आपका स्वागत है”, इससे ग्रामीणों को काफी खुशी हुई।
- मोनिक शाह ने बताया कि उत्तराखंड में खुले में शौच की काफी समस्या है। इसी को देखते हुए उन्हें पौड़ी जिला प्रशासन की ओर से शौचालय का मॉडल विकसित करने का मौका मिला। उन्होंने कहा, “सामान्यतः शौचालय बनाने में 3500-4000 ईंट और 25-30 सीमेंट की बोरियां लगती है, लेकिन हमने इसे मात्र 2 हजार ईंट और 15 बैग सीमेंट में बना दिया। इससे घर को थर्मल इंसुलेशन भी मिल गया।“मोनिक शाह कहते हैं कि इस परियोजना का उद्देश्य ग्रामीणों को शौचालय के महत्व को बताना था। इसलिए उन्होंने स्थानीय लोगों की जरूरतों को समझते हुए इसमें वेंडिंग मशीन, ब्रेस्ट फीडिंग रूम, आदि की भी व्यवस्था की। इस तरह, 150 वर्ग फीट के इस शौचालय को बनाने में महज 2 लाख रुपए खर्च हुए।